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#वस्तुपूजावाद #सामाजिकरूपसेआवश्यकश्रमसमय #अतिरिक्तमूल्य #पूंजीकापरिसंचरण #लाभदरमेंगिरावटकीप्रवृत्ति #Capital
कार्ल मार्क्स की कैपिटल, जिसे दास कैपिटल भी कहा जाता है, राजनीतिक अर्थव्यवस्था की आलोचना करने वाली आधुनिक युग की सबसे प्रभावशाली कृतियों में है. यह उपन्यास या सामान्य अर्थशास्त्र की पाठ्यपुस्तक नहीं, बल्कि पूंजीवादी व्यवस्था के उत्पादन, विनिमय, लाभ और संकटों का सैद्धांतिक विश्लेषण है. इस फिंगरप्रिंट क्लासिक्स संस्करण में तीनों खंड एक साथ संकलित हैं. पहला खंड मार्क्स के जीवनकाल में प्रकाशित हुआ था, जबकि दूसरे और तीसरे खंड को उनकी मृत्यु के बाद फ्रेडरिक एंगेल्स ने मार्क्स की पांडुलिपियों के आधार पर संपादित किया. मार्क्स का मूल प्रश्न है कि बाजार में वस्तुओं का आदान प्रदान बराबरी का दिखते हुए भी पूंजी और श्रम के बीच असमान संबंध कैसे बनाता है. इसके उत्तर में वे वस्तु, मूल्य, मजदूरी, श्रम शक्ति, अतिरिक्त मूल्य, संचय और वर्ग संबंधों की परस्पर जुड़ी व्याख्या देते हैं. पुस्तक का उद्देश्य केवल पूंजीवाद की नैतिक निंदा करना नहीं है, बल्कि उसकी कार्यप्रणाली और अंतर्विरोधों को ऐतिहासिक दृष्टि से समझना है.