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पेडागॉजी ऑफ होप, रिलिविंग पेडागॉजी ऑफ द ओप्रेस्ड, ब्राज़ीली शिक्षाविद पाउलो फ्रेइरे की १९९२ में प्रकाशित चिंतनपरक पुस्तक है. यह उनकी अत्यंत प्रभावशाली कृति पेडागॉजी ऑफ द ओप्रेस्ड के विचारों की पुनर्व्याख्या, आत्मालोचना और विस्तार प्रस्तुत करती है. यह कोई क्रमबद्ध शिक्षण-पद्धति की नियम-पुस्तिका नहीं है, बल्कि शिक्षा, सत्ता, सामाजिक अन्याय और मानवीय मुक्ति पर एक वैचारिक संवाद है. फ्रेइरे अपने अनुभवों, आलोचकों की प्रतिक्रियाओं और विभिन्न सामाजिक संदर्भों के माध्यम से बताते हैं कि शिक्षा कभी तटस्थ क्रिया नहीं होती. वह या तो मौजूद असमानताओं को सामान्य मानने की आदत को मजबूत करती है, या लोगों को उन असमानताओं को पहचानने और बदलने में सक्षम बनाती है. पुस्तक की विशिष्ट धुरी आशा है, जिसे फ्रेइरे निष्क्रिय सकारात्मकता नहीं, बल्कि संघर्ष के लिए आवश्यक मानवीय जरूरत मानते हैं. फिर भी उनके लिए आशा अकेले पर्याप्त नहीं है. उसे आलोचनात्मक समझ, सामूहिक संवाद और ठोस सामाजिक कार्रवाई से जुड़ना होता है. इसीलिए यह पुस्तक शिक्षा-दर्शन के साथ लोकतंत्र और सामाजिक परिवर्तन पर भी विचार करती है.