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ई. एफ. शूमाखर की स्मॉल इज़ ब्यूटिफुल अर्थशास्त्र पर निबंधों का प्रभावशाली संकलन है, जो पहली बार उन्नीस सौ तिहत्तर में प्रकाशित हुआ था. इसका उपशीर्षक, इकोनॉमिक्स ऐज़ इफ पीपल मैटर्ड, पुस्तक के मूल उद्देश्य को स्पष्ट करता है. शूमाखर उस आर्थिक सोच की आलोचना करते हैं जिसमें उत्पादन, उपभोग, विशाल संस्थाएँ और सकल वृद्धि ही प्रगति के मुख्य मापदंड बन जाते हैं. उनके अनुसार ऐसी व्यवस्था मानव गरिमा, स्थानीय समुदाय, प्रकृति और दीर्घकालिक स्थिरता को पीछे धकेल देती है. पुस्तक ऊर्जा संकट और औद्योगिक विस्तार के दौर में लिखी गई थी, लेकिन इसके प्रश्न आज भी प्रासंगिक हैं. यह पारंपरिक अर्थशास्त्र की पाठ्यपुस्तक नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था के नैतिक आधारों की जाँच है. शूमाखर छोटे पैमाने, विकेंद्रीकरण, उचित तकनीक, सार्थक काम और सीमित संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग का पक्ष रखते हैं. वे न तो केवल बाजार का समर्थन करते हैं, न केंद्रीकृत राज्य नियंत्रण का. उनका आग्रह है कि आर्थिक साधनों का मूल्यांकन इस आधार पर हो कि वे लोगों और समुदायों के लिए वास्तव में क्या करते हैं.