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पेरी मेहरलिंग की द न्यू लॉम्बार्ड स्ट्रीट, दो हजार ग्यारह में प्रकाशित मौद्रिक अर्थशास्त्र और वित्तीय इतिहास की पुस्तक है. इसका केंद्र प्रश्न यह है कि आधुनिक संकटों में अमेरिकी फेडरल रिजर्व की वास्तविक जिम्मेदारी क्या बन चुकी है. लेखक वाल्टर बैजहॉट की उन्नीसवीं सदी वाली अवधारणा, लेंडर ऑफ लास्ट रिजॉर्ट, को आधार बनाते हैं. उस मॉडल में केंद्रीय बैंक संकटग्रस्त बैंकों को पर्याप्त जमानत के बदले ऋण देता है. मेहरलिंग का तर्क है कि आधुनिक, बाजार आधारित वित्त में यह परिभाषा अपर्याप्त है. जब प्रतिभूतियों के खरीदार गायब हो जाते हैं और बाजार कीमतें तेजी से गिरती हैं, तब समस्या केवल बैंकों की नकदी नहीं, बल्कि पूरे बाजार की खरीद और बिक्री क्षमता होती है. इसलिए फेड को डीलर ऑफ लास्ट रिजॉर्ट की भूमिका अपनानी पड़ती है, अर्थात संकट में प्रतिभूतियों के लिए अंतिम खरीदार या वित्तदाता बनना पड़ता है. पुस्तक दो हजार आठ के वित्तीय संकट को केवल दुर्घटना नहीं मानती, बल्कि अमेरिकी वित्तीय संस्थाओं, डीलर व्यवस्था, डेरिवेटिव और शैडो बैंकिंग के दीर्घ विकास का परिणाम बताती है. इसका उद्देश्य फेड की नीतियों को मुद्रा की मात्रा के बजाय तरलता, कीमतों और बैलेंस शीटों के दृष्टिकोण से समझाना है.