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#वित्तीयघबराहट #रेपोबाजार #छायाबैंकिंग #रनयोग्यअल्पकालिकऋण #शांतकालकानियमन #MisunderstandingFinancialCrises
गैरी बी. गॉर्टन की यह पुस्तक वित्तीय संकटों पर एक विश्लेषणात्मक, इतिहास और आर्थिक सिद्धांत को जोड़ने वाली गैर कथा कृति है. इसका केंद्रीय प्रश्न सीधा है, यदि बैंकिंग और वित्तीय बाजार स्वभावतः अस्थिर हो सकते हैं, तो अर्थशास्त्री और नियामक बड़े संकटों को पहले क्यों नहीं पहचान पाते. गॉर्टन दो प्रचलित धारणाओं को चुनौती देते हैं. पहली, कि हर संकट असंबद्ध दुर्घटनाओं का अनोखा संयोग होता है. दूसरी, कि अमेरिका में उन्नीस सौ चौंतीस से दो हजार सात तक का लंबा शांत काल यह सिद्ध करता है कि संकट समाप्त हो चुके थे. उनके अनुसार यह शांति प्रभावी संस्थागत सुरक्षा का परिणाम थी, न कि जोखिम के गायब हो जाने का प्रमाण. पुस्तक विशेष रूप से बैंक ऋण, तरलता, अल्पकालिक देनदारियों, रेपो बाजार, ऋण उछाल, नैतिक जोखिम और अत्यधिक बड़े वित्तीय संस्थानों की भूमिका समझाती है. दो हजार सात से आठ की घबराहट को केंद्र में रखकर गॉर्टन दिखाते हैं कि वित्तीय नवाचार के साथ नियमन और आर्थिक समझ न बदले, तो संकट अक्सर दृष्टि से छिपे रहते हैं.