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चार्ल्स पी किंडलबर्गर की द वर्ल्ड इन डिप्रेशन, नाइन्टीन ट्वेंटी नाइन से नाइन्टीन थर्टी नाइन, बीसवीं सदी की महामंदी का एक प्रभावशाली आर्थिक इतिहास है. यह केवल शेयर बाज़ार के ध्वंस से शुरू होने वाली कथा नहीं है, बल्कि युद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, स्वर्ण मानक, व्यापार, पूंजी प्रवाह और बैंकिंग संकटों के परस्पर संबंधों का विश्लेषण है. किंडलबर्गर का केंद्रीय तर्क है कि मंदी की असाधारण गहराई और अवधि का कारण नेतृत्व का अंतराल था. ब्रिटेन प्रथम विश्व युद्ध के बाद विश्व अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने में सक्षम नहीं रहा, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका ने वह भूमिका लेने से परहेज किया. लेखक इस स्थिति को अंतरराष्ट्रीय सहयोग की विफलता के रूप में देखते हैं. पुस्तक आर्थिक इतिहास, अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक अर्थव्यवस्था और वित्तीय संकटों के अध्ययन के बीच पुल बनाती है. इसका उद्देश्य किसी एक घटना को दोष देना नहीं, बल्कि दिखाना है कि जब राष्ट्र अपने सीमित हितों में सिमटते हैं, तब वैश्विक परस्पर निर्भरता संकट को कई गुना बढ़ा सकती है.