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हांस प्रिंत्सहॉर्न की आर्टिस्ट्री ऑफ द मेंटली इल, मूलतः उन्नीस सौ बाईस में प्रकाशित एक प्रभावशाली मनोचिकित्सकीय और कला-ऐतिहासिक अध्ययन है. इसका विषय मनोरोग संस्थानों के रोगियों द्वारा बनाई गई चित्रकृतियां, रेखांकन, वस्तुएं और अन्य सृजन हैं. प्रिंत्सहॉर्न ने इन्हें केवल रोग के लक्षण या चिकित्सकीय दस्तावेज मानने से इनकार किया. उनका उद्देश्य यह समझना था कि सीमित और पीड़ाग्रस्त परिस्थितियों में भी मनुष्य की रचनात्मक शक्ति किस तरह रूप, प्रतीक, सजावट और अभिव्यक्ति में प्रकट होती है. पुस्तक का मूल जर्मन शीर्षक बिल्डनेराइ डेर गाइस्टेसक्रांकेन है, जिसमें बिल्डनेराइ शब्द को जानबूझकर अपेक्षाकृत तटस्थ अर्थ में चुना गया, ताकि कला की पारंपरिक कसौटियों से पहले रचनात्मक प्रक्रिया को देखा जा सके. यह कृति सौंदर्यशास्त्र, मनोविज्ञान और मनोरोग-विज्ञान की सीमारेखा पर खड़ी है. आज इसे पढ़ते समय इसकी ऐतिहासिक महत्ता के साथ इसकी पुरानी निदान-भाषा और लेखक के विवादास्पद वैचारिक संदर्भ को भी आलोचनात्मक दृष्टि से समझना आवश्यक है.