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#स्वर्णमानक #ब्रेटनवुड्सव्यवस्था #विनिमयदरस्थिरता #अंतरराष्ट्रीयपूंजीगतिशीलता #मौद्रिकसंघऔरयूरो #GlobalizingCapital
बैरी आइकेनग्रीन की ग्लोबलाइजिंग कैपिटल अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक व्यवस्था का इतिहास और राजनीतिक अर्थशास्त्र है. तीसरा संस्करण इस कहानी को उन्नीसवीं सदी के स्वर्ण मानक से लेकर वैश्विक वित्तीय संकट, यूरोपीय ऋण संकट, चीन के उभार और डॉलर की भूमिका पर समकालीन बहसों तक ले जाता है. पुस्तक का उद्देश्य केवल यह बताना नहीं है कि विनिमय दर व्यवस्थाएं कब बदलीं. यह समझना भी है कि वे किन राजनीतिक परिस्थितियों में टिकती हैं, क्यों टूटती हैं, और पूंजी के सीमापार प्रवाह उनसे कैसे जुड़े रहते हैं. आइकेनग्रीन का केंद्रीय तर्क है कि मौद्रिक व्यवस्थाओं को स्थिर तकनीकी नियमों की तरह नहीं समझा जा सकता. घरेलू रोजगार, ब्याज दर, महंगाई, लोकतांत्रिक जवाबदेही और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बीच तनाव हर व्यवस्था की दिशा तय करता है. संक्षिप्त लेकिन विश्लेषणात्मक शैली में लिखी गई यह पुस्तक आर्थिक इतिहास को नीति की वर्तमान समस्याओं से जोड़ती है. इसलिए यह अंतरराष्ट्रीय वित्त का परिचय भर नहीं, बल्कि मुद्रा, राज्य और वैश्विक बाजार के बदलते संबंधों की व्याख्या है.