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यह संकलन कार्ल मार्क्स की दो संक्षिप्त लेकिन प्रभावशाली राजनीतिक अर्थशास्त्र संबंधी रचनाओं को एक साथ रखता है, वेज लेबर एंड कैपिटल और वैल्यू, प्राइस एंड प्रॉफिट. पहली रचना उन्नीसवीं सदी के मध्य में ब्रुसेल्स के जर्मन कामगारों के लिए दिए गए व्याख्यानों से निकली थी. दूसरी, उन्नीसवीं सदी के छठे दशक में इंटरनेशनल वर्किंगमेन्स एसोसिएशन की जनरल काउंसिल के समक्ष दिया गया तर्कपूर्ण संबोधन है. दोनों का उद्देश्य अर्थव्यवस्था की रोजमर्रा की दिखने वाली श्रेणियों, जैसे मजदूरी, कीमत, पूंजी और मुनाफे, के पीछे छिपे सामाजिक संबंधों को समझाना है. मार्क्स यह प्रश्न उठाते हैं कि श्रमिक को उसके काम का पूरा फल क्यों नहीं मिलता, वस्तुओं का मूल्य कैसे बनता है, और मजदूरी बढ़ने का मुनाफे व कीमतों से क्या संबंध है. यह किसी तटस्थ अर्थशास्त्र की पाठ्यपुस्तक की तरह नहीं, बल्कि पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था की आलोचनात्मक व्याख्या है. इसकी भाषा अपेक्षाकृत सुलभ है, फिर भी तर्कों को समझने के लिए मूल्य, श्रमशक्ति और बाजार-कीमत के बीच के भेद पर सावधानी से ध्यान देना पड़ता है.